• Adinath Akhara Slideshow
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‘अखाड़ा’ शब्द संस्कृत ‘अक्षवाट’ शब्द का तद्भव रूप है। संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध शब्द कोश शब्द कल्पद्रुम (प्रथम खण्ड-पृष्ठ-06) में अक्षवाट का अर्थ अखाड़ा उल्लिखित है। "अक्षस्य मल्लयुद्धस्य वाटः परिसरः -मल्लभूमिः तत्पर्यायः -नियुद्धभूः अखाड़ा इति" लोक में भी अखाड़ा शब्द मल्लक्रीड़ा के लिए निर्मित उस स्थान विशेष को कहा जाता है जहाँ मल्लगण अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। परस्पर नियुद्ध (कुश्ती) करके शक्ति प्राप्त करते हैं और प्राप्त शक्ति का लोकहित में प्रयोग करते हैं। ठीक उसी तरह साधु-सन्तों के अखाड़े में सिद्धान्तों और आचार-विचारों का मन्थन होता है और उससे ज्ञान की सम्प्राप्ति होती है। ज्ञानी और सन्तजन उस प्राप्त ज्ञान से लोककल्याण करते हैं।

प्रत्येक अखाड़े का एक मूल स्थान होता है जिसे शिरामत्था कहा जाता है। साथ ही देवता, देवी और एक विशिष्ट मंत्र भी होता है। श्रीआदिनाथ अखाड़े के अधिष्ठाता परमपूज्य श्रीबाबा जी महाराज के अनुसार अखाड़े की सूक्ष्म क्रियाओं तथा रहस्यों को सुयोग्य साधक अथवा अधिकारी व्यक्ति के सम्मुख प्रकाशित किया जाता है।

श्रीआदिनाथ पीठाधीश्वर बाबा त्रिलोकीनाथ जी ने कृच्छ् तपश्चर्या और गहनातिगहन साधना के पश्चात् श्रीआदिनाथ अखाड़े की स्थापना की है। देवभूमि हिमालय के गगनस्पर्शी शिखरों के मध्य प्रकृतिनिर्मित गुफाओं में अखण्ड तपस्या तथा असंख्य तीर्थों में विचरण के पश्चात् अपनी चेतना के दिव्य आकाश में अव्यक्त रूप से विद्यमान अखाड़े की कल्पना को साकार किया। श्रीबाबा जी ने बक्सर आगमन के बाद भी अपनी तपश्चर्या और तीर्थ परिक्रमा का क्रम अनवरुद्ध रखा। 1974 में श्रीआदिनाथ पीठाधीश्वर श्रीत्रिलोकीनाथ जी महाराज ने गोमुख से जल ग्रहण करके वर्षपर्यन्त पदयात्रा करते हुए सुदूर दक्षिण सेतुबंध रामेश्वरम् में ज्योतिर्लिंग का पवित्र जल से अभिषेक करने के उपरांत पदयात्रा पूर्ण की। 1982 ई. में कैलास मानसरोवर यात्रा श्रीबाबा जी ने की। मानसरोवर की दुर्गम परिक्रमा में सहयात्रियों की गति धीमी पड़ गई थी। पर्वतीय यात्रा में निपुण श्रीबाबा जी महाराज अकेले ही आगे बढ़ते गये। प्राणवायु की कमी, दुर्गम यात्रा, फिर भी एक-एक पग आगे बढ़ते रहें। यह अपने ढंग की अनोखी तपस्या थी। एक बिन्दु ऐसा आया जहाँ से आगे बढ़ना अशक्य प्रतीत होने लगा। वाणी द्वारा मंत्रोच्चार का क्रम टूटने को हुआ। उसी समय एक अतितीव्र प्रकाश की धारा उनके दिव्य शरीर का अभिषेक करने लगी और वायुमण्डल में एक मंत्र-ध्वनि गूँजने लगी। जैसे भगवान आदिनाथ महेश्वर शिव यह कह रहे हों कि श्वासों के द्वारा ही मंत्र जपकर परमेश्वर से तादत्म्य स्थापित किया जा सकता है। यह प्रत्यक्ष अनुभूति अपूर्व थी। दिव्य प्रकाश और अमृत ध्वनि के माध्यम से भगवान आदिनाथ ने प्रत्यक्ष दर्शन दिये थे। यात्रा निवृत्ति के पश्चात् श्रीबाबा जी ने परम प्रभु से नादात्मक संकेत प्राप्त कर "श्रीआदिनाथ अखाड़े" का प्रवर्तन किया। 

श्री आदिनाथ अखाड़ा शिव तत्त्व का उपासक है. यहाँ प्रकाश स्वरूप निराकार शिव की उपासना होती है. सभी मनुष्य इस शिव तत्त्व की प्राप्ति के अधिकारी है. शुद्ध आचरण, सर्व कल्याण, जीव दया और आस्तिक बुद्धि से योग और नादानुसंधान के द्वारा भगवान आदिनाथ शिव की प्राप्ति ही साधना का लक्ष्य है. यद्यपि श्री आदिनाथ निर्गुण निराकार है तथापि ध्यान साधना में एकाग्रता के लिए पंचमुखी शिव के स्वरूप को आधार माना जाता है. यहाँ नव नाथ और चौरासी सिद्धों का सर्वाधिक महत्व है. नव नाथ पुरुष, प्रकृति, पृथ्वी, जल, वनस्पति आदि तत्त्वों के प्रतीक है. नवनाथों के नाम है क्रमशः आदिनाथ, उदयनाथ,सत्यनाथ, संतोषनाथ, अचलअचंभे नाथ, गजबेली गजकन्थड़नाथ, चौरंगीनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ तथा गोरक्षनाथ. चौरासी लाख योनियों से मुक्त होकर शिव तत्त्व में लीन होने के लिए इनका सहारा लिया जाता है. श्री आदि नाथ अखाड़ा अनादि है किंतु वर्तमान समय मे इसके संस्थापक श्री आदिनाथ पीठाधीश्वर श्री त्रिलोकीनाथ जी महाराज (श्री नाथ बाबा जी) हैं. इसका प्रधान केंद्र सिद्धाश्रम स्थित श्री आदिनाथ अखाड़ा, श्री नाथ आश्रम, चरित्रवन, बक्सर है. 
इसकी शाखाएँ

  • श्री सिद्धलोक आश्रम, हरीपुर कला, हरिद्वार, देहरादून, उत्तराखंड
  • श्री शिव भैरवनाथ मंदिर, गुलाबीबाग, नई दिल्ली
  • चंद्रशिला, तुंगनाथ, उत्तराखंड (श्री आदिनाथ अखाड़े का शिरा मत्था)
  • श्री नवनाथ सिद्धधाम, त्रयम्बकेश्वर, नासिक, महाराष्ट्र

उक्त शाखाओं के संस्थापक, संरक्षक, सर्वाधिकारी श्री नाथ बाबाजी हैं. उन्हीं के आदेश पर पूर्वोक्त शाखाओं की देखभाल का कार्य महामंडलेश्वर योगी श्री शीलनाथ जी महाराज करते हैं.